दुर्भाग्यपूर्ण: आखिर कहा गुम हो गया अजूबा वृक्ष....... दियोरिया कलां के राम वट वृक्ष की कहानी

दुर्भाग्यपूर्ण: आखिर कहा गुम हो गया अजूबा वृक्ष.......

दियोरिया कलां के राम वट वृक्ष की कहानी

मुकेश सक्सेना की कलम से...

दुर्भाग्यपूर्ण .......

 आखिर कहां गुम हो गया, हजारों वर्ष पुराना "अजूबा वृक्ष" ऐसा वृक्ष जिस पर नाम लिखने की ललक हुआ करती थी और दूर दूर से लोग आते थे आज इस वृक्ष का अस्तित्व और अवशेष दोनों नष्ट हो गए। दर्शनीय और अजूबे वृक्ष की समाज ने तो अहमियत रख थी परन्तु वन विभाग ने कभी भी उसकी अहमियत नहीं समझी, यही वजह रही बेचारा हजारों वर्ष पूर्व जन्मा वृक्ष संरक्षण और संवर्धन के अभाव में रूखसत हो गया। आज न तो वृक्ष है और न ही उसकी लकड़ी के अवशेष -? भला कहीं ऐसा भी होता है, जिससे दियोरिया कलां की पहचान हो और पीलीभीत में दुर्लभ वृक्ष होने की चर्चा दूर दूर हो, तो फिर उस वृक्ष की देख देख भी जरुरी हो जाती है क्यों कि उस वृक्ष के अलावा उस तरह का दूसरा कोई वृक्ष नहीं था वो पीलीभीत में एकलौता जन्मा वृक्ष था। 

आज उस तरह का अन्य कोई वृक्ष दूर दूर तक नहीं है। आप को बता दें यह वृक्ष हजारों वर्ष पुराना था पूरा वृक्ष सफेद था और दियोरिया कलां बन रेंज के अंतर्गत एक किसान की निजी संपत्ति में था। वृक्ष की छाल पर हजारों नाम लिखे थे। पूरा वृक्ष लोगों के नाम से घिरा था उस जमाने में लोगों ने हाथियों पर चढ़कर नाम लिखे थे। वृक्ष दर्शनीय बन चुका था दूरदराज से लोग इसे निहारने आते थे। वृक्ष की छाल पर नाम लिखने के बाद कभी मिटते नहीं थे भले ही बसंती ऋतु में पतझड आ जाए और वृक्ष की छाल उतर कर नए परिवेश को धारण कर लें फिर भी लिखे गए नाम जैसे के तैसे बने रहते। बताते हैं, कि लोगों ने वृक्ष की कलम लगाकर वृक्ष तैयार करने की कोशिश कई बार की लेकिन नया वृक्ष नहीं जन्मा यहां तक की उस वृक्ष के बीज से भी कोई वृक्ष पैदा नहीं हुआ। इसलिए इसको अजूबा वृक्ष का नाम दिया गया। वनस्पति शास्त्र में भले ही इसका नाम कुछ भी हो और प्रजातियां भी हो लेकिन यहां के लोग हमेशा वृक्ष के उत्पत्ति जीवन के मूल से अज्ञात आज भी है। इसलिए एकलौता और नाम के निरंतर बने रहने से आम तौर पर उस वृक्ष को अजूबा नाम दे रखा था। इसे धार्मिक आस्था के तहत राम वट वृक्ष का नाम भी दे रखा था।

किवदंती..

वृक्ष के सम्बन्ध में किंवदंती थी कि किसी तपसी संत के प्रताप से इस अजूबा वृक्ष का जन्म हुआ था गांव के सबसे दियोरिया कलां गांव के सबसे बड़े बुजुर्ग राम बहादुर लाल मिश्रा 95 वर्ष ने वृक्ष के सम्बन्ध में प्रचलित कहानी के बारे में बताया कि हजारों वर्ष पूर्व किसी तपस्वी संत की दातून से इस वृक्ष की उत्पत्ति बताई जाती है। इसलिए इस तरह का अभी तक के इतिहास में कोई अन्य वृक्ष इस क्षेत्र में तो नहीं है। एक मात्र अजूबा वृक्ष था। दशक पूर्व वृक्ष सूख गया और उसके अवशेष भी नष्ट हो गए। कुंवर महीप सिंह चंदेल ने तो यह भी कहा इस वृक्ष से भी दियोरिया कलां की एक अलग पहचान थी। आज वृक्ष का नष्ट होना अंकुर रहा है। दियोरिया कलां के राजवीर सिंह ने भी कहा उस वृक्ष को मैंने देखा था वैसा वृक्ष अब दूर दूर तक नजर‌ नहीं आता। नवीन कुमार सिंह, पत्रकार विनोद मिश्रा सहित तमाम लोग ने इस तरह का एकलौता और अजूबा वृक्ष होने की पुष्टि की है।

संरक्षण ....  

संरक्षण और संवर्धन की बात की जाए तो वन प्रशासन को वृक्ष के अस्तित्व को बचाने के लिए अहम भूमिका में होना चाहिए था वेशक वृक्ष किसान की निजी संपत्ति में था फिर भी समाज के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित किए था ऐसे में वन विभाग को उसके संरक्षण और संवर्धन में अग्रणी भूमिका में आना चाहिए था और समाज को भी इस धरोहर को संजोकर रखाने की जरूरत थी। बताते हैं कि किसान खेत जोतता रहा और जड़ें नष्ट होती गई और वृक्ष सूखता रहा और आज फिर सदियों पुरानी वृक्ष के जीवन के साथ उसकी जीवनी का भी अंत होता चला गया। यदि संत की किवदंती को महत्व दिया जाए तो फिर अब वो न तो संत रहे और न ही उनकी दातून। क्योंकि आज तक उस वृक्ष की टहनी और बीज से न तो दूसरा वृक्ष उगा और नहीं है अब कोई उम्मीद है। 

बस अब यह जरूर है कि यदि इस प्रजाति के वृक्ष अन्य कहीं उपलब्ध है तो वन विभाग को पुनः स्थापित करने की पहल करनी चाहिए। आप की क्या राय है कैमेंट में जरूर लिख। खास कर जिन लोगों ने वृक्ष देखा है या नाम उस पर लिखा है वो अभिव्यक्ति जरूर रखिएगा। धन्यवाद